भोरमदेव मंदिर छत्तीसगढ़ का एक खूबसूरत प्राचीन मंदिर

Bhoramdev chhattisgarh

प्राचीन मंदिर भोरमदेव मंदिर जिला कवर्धा से उत्तर पश्चिम में 18 किलोमीटर की दूरी पर सतपुड़ा मैकल पहाड़ियों के तल में बसे हुए चौरा गांव में स्थित है। भोरमदेव मंदिर का निर्माण फणी नागवंश के छठवें राजा गोपाल देव द्वारा 11 वीं शताब्दी 1087 ई में कराया गया था। स्थापत्यकला से परिपूर्ण यह मंदिर लोगों को देखने के लिए आकर्षित करता है। इस मंदिर में बनाए गए तीन प्रवेश द्वार जो तीनों की आकृति अर्द्ध मंडप जैसी ही दिखाई देती है। इस मंदिर मंडप में 16 स्तंभ तथा चारों कोनों पर चार अलंकृत भित्ति स्तंभ है। मंदिर के वर्गाकार गर्भगृह में हाटकेश्वर महादेव विशाल जलाधारी के मध्य प्रतिष्ठित है। गर्भगृह में ही पद्मासना राजपुरूष सपत्नीक,पदमासना सत्पनीक ध्यान मग्य योगी,नृत्य गणपति की अष्ठभूजी प्रतिमा तथा फणीनागवंशी राजवंश के प्रतीक पांच फणों वाले नाग प्रतिमा रखी हुई है। काले भूरे बलुआ पत्थरों से निर्मित मंदिरी की वाहय दीवानों पर देवी देवताओं की चित्ताकर्षक एवं द्विभुजी सूर्यप्रतिमा प्रमुख  है। मंदिर के वाह्य सौदर्य दर्शन का सबसे उपयुक्त स्थल ईशान कोण अर्थात भोरवदेव के ठीक सामने है,यहां से मंदिरन रथाकार दिखाई देखता है। यह मंदिर तल विन्यास से सप्तरथ चतुरंग,अंतराल,अंलकृत, स्तंभों से युक्त वर्गाकार मण्डप है। उर्ध्व विन्यास में उधिष्ठान जंघा एवं शिखर मंदिर के प्रमुख अंग हे। मंदिर के जंघा की तीन पंकित्यों में विभिन्न देवी देवताओं की कृष्णलीला, नायक-नायिकाओं, अष्ठद्विकपालों, युद्ध एवं मैथुन दृष्यों में अलंककरण किया गया है। मंदिर के भद्ररथि पर उकेरी प्रतिमाए विशेष कलात्मक और आकर्षक है,एवं शिखर मंजरियों से अलंकृत है। भोरमदेव में मूर्तियों की विधिवत गतिशीलता एवं लोच, दर्शकों के मन को भाव विभोर एवं मुग्ध कर देते है।

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